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चैत्र नवरात्र में कौड़िया से बोहानी विराजती हैं मिढ़वानी माता, 150 वर्षों पुरानी है जिले के सबसे बड़े किसान मेले की परंपरा

"मिढ़वानी मेला" आस्था, भक्ति और परंपरा का पवित्र संगम

गाडरवारा (नरसिंहपुर)। चैत्र नवरात्र में जब सम्पूर्ण भारत माता रानी के विविध रूपों की उपासना में डूबा होता है, उस समय मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले में एक अनोखी और ऐतिहासिक परंपरा जीवंत होती है—मिढ़वानी माता मेला। कौड़िया गांव से बोहानी तक यह मेला न केवल आस्था का उत्सव है, बल्कि यह किसानों और ग्रामीण संस्कृति का एक सजीव प्रतीक भी है।

मूल स्थान कौड़िया, लेकिन विराजमान होती हैं बोहानी में

मिढ़वानी माता का मूल मंदिर नरसिंहपुर जिले के ग्राम कौड़िया में स्थित है। लेकिन हर वर्ष चैत्र शुक्ल षष्ठी (छठवीं तिथि) को माता विशेष रूप से वैदिक विधि-विधान से कौड़िया से बोहानी ग्राम से आगे सिहोरा रोड पर स्थित मिढवानी मेला स्थल में विराजमान होती हैं। 12 अप्रैल (एकादशी) तक माता यही विराजती हैं और द्वादशी को पुनः अपने मूल स्थान पर लौट जाती हैं।

बीजासेन, बाराही, दुर्गा—अनेक रूपों में पूजित मिढ़वानी माता

श्रद्धालुओं के अनुसार मिढ़वानी माता कोई साधारण देवी नहीं, बल्कि जगतजननी अम्बे का ही स्वरूप हैं। उन्हें मां बीजासेन, माँ बाराही, माँ दुर्गा जैसे नामों से जाना जाता है। नवरात्र के इन विशेष दिनों में लाखों भक्त माता के दर्शन के लिए आते हैं और हल्दी के हाथे चढ़ाकर मनोकामना करते हैं।

150 वर्षों से अधिक पुरानी परंपरा, ऐतिहासिक प्रमाण भी उपलब्ध

इस मेले का इतिहास अत्यंत समृद्ध और पुरातन है। लगभग 150 वर्षों से भी अधिक समय से यह परंपरा चली आ रही है। इतिहासकारों और स्थानीय दस्तावेजों के अनुसार, ग्राम डोभी के जागीरदार खैरौनिया परिवार के मुखिया, जो किरार समाज से थे, ने कौड़िया निवासी पं. देवीप्रसाद पारासर पंडा महाराज के गृह विजय लक्ष्मी दीक्षित भवन में बने दुर्गामंदिर (तंत्रपीठ) में स्थापित माँं दुर्गा की महिमा से अभिभूत होकर दानवीर राघव जी बोहानी के पूर्वजों एवं ग्राम बोहानी के सहयोग से इस मिढवानी मेले का शुभारंभ किया था। जिससे मां सबको दर्शन देकर सबके कष्टों का निवारण कर सके। तब से लगातार हर वर्ष चैत्र नवरात्र पर माँ के लाखों भक्त यहां इन पांच दिनों में आकर मनवांछित फल प्राप्त कर मेले का आनंद उठाते हैं। यहाँ यह मान्यता है जो भक्त जैसी मनोकामना लेकर यहां आता है, वह अवश्य ही वह पूरी होती है। जो भक्त पुत्र की चाह लेकर माँ के दरबार में आता है उसे जरूर गुणवान पुत्र प्राप्त होता है।

1905 के गजेटियर में दर्ज है यह मेला

मिढ़वानी माता मेला केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण आयोजन है। वर्ष 1905 के नरसिंहपुर गजेटियर में इसे “जिले का सबसे बड़ा किसान मेला” बताया गया है। यह उस दौर से ही ग्रामीण व्यापार, कृषि सामग्री, बैल, हल, कृषि उपकरणों की खरीद-बिक्री और मेल-मिलाप का केंद्र रहा है।

पूजा की विशेष परंपरा, पं. पारासर परिवार निभा रहा दायित्व

आज भी सप्तमी की प्रथम पूजा मिढवानी मेला मंदिर में खैरौनिया परिवार के वंशज ही करने आते हैं। उनके उपरान्त ही अन्य भक्त पूजा करते हैं। पं देवी प्रसाद पारासर के बाद उनके पुत्र पं. प्यारेलाल पारासर उसी पारंपरागत वैदिक रीति से पूजा करवाते रहे हैं। उनके बाद इसी परिवार की कर्मठ महिला मोहन देवकुअंर बाई पारासर (पंडन बऊ)जो सबसे अधिक समय उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए पूजा करवातीं रहीं हैं। उनकी सब संतानें समाप्त हो गई तब पंडन बऊ ने अपनी वृद्धावस्था को देखते हुए अपने भांजे पं. महानंद दीक्षित को दत्तक पुत्र गृहण कर उनको पूजा करवाने का विधिवत अधिकार दिया। जिससे यह मिढवानी मेला की परंपरा प्रवाहित होती रहे। उनके बाद स्व पं. अम्बिका प्रसाद दीक्षित के वंशज आज भी उसी वैदिक परंपरागत से पूजक बने हैं। पंडितजी ने बताया हमें भीे पंडा महाराज परिवार के वंशज होने का गौरव मिला हैं हम और हमारे छोटे भाई अजय दीक्षित भी उन पांच दिन सभी वैदिक नियमों का पालन करते हुए मां की सेवा में मिढवानी मेला में उपस्थित रहते हैं।

मातेश्वरी की कृपा से पूरी होती है हर मनोकामना

यहां यह दृढ़ मान्यता है कि जो भक्त मातारानी के दरबार में सच्चे मन से कोई कामना लेकर आता है, उसकी हर इच्छा अवश्य पूरी होती है। विशेषकर संतान प्राप्ति की कामना से आने वालों को पुत्र रत्न की प्राप्ति होने की कथाएं खूब प्रसिद्ध हैं। हल्दी के हाथे चढ़ाना यहाँ की विशेष आस्था का प्रतीक है।

इस वर्ष मेला 3 से 12 अप्रैल तक, श्रद्धालुओं की भारी भीड़

इस बार चैत्र शुक्ल षष्ठी को 3 अप्रैल को माता मिढ़वानी पूरे वैदिक मंत्रोच्चार और विधिविधान के साथ कौड़िया से मेला स्थल पहुंचीं। 4 अप्रैल को सप्तमी के दिन भव्य पूजा और आरती के साथ मेले की शुरुआत हुई, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। 12 अप्रैल तक माता के दर्शन एवं मेला चलने की व्यवस्था की गई है।

मुख्य तथ्य संक्षेप में:

  • स्थान: मिढ़वानी मेला स्थल, सिहोरा रोड, बोहानी (जिला नरसिंहपुर)
  • आरंभ तिथि: 3 अप्रैल (षष्ठी)
  • मुख्य पूजा दिवस: 4 अप्रैल (सप्तमी)
  • समापन: 12 अप्रैल (एकादशी), 13 अप्रैल को माता की वापसी
  • विशेषता: जिले का सबसे बड़ा किसान मेला, मान्यताओं से परिपूर्ण धार्मिक आयोजन
  • संवाहक परिवार: पं. पारासर परिवार, कौड़िया

अगर आप भी इस ऐतिहासिक मेले का हिस्सा बने हों, तो अपनी तस्वीरें, अनुभव और वीडियो हमारे पोर्टल पर भेजें। चयनित पोस्ट को हमारी वेबसाइट और सोशल मीडिया पर फीचर किया जाएगा।

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